दहशत में भाई....?

व्ही.एस.भुल्ले/ भाई की सरकार के,सफलता के पचे कोई कितने ही क्यो न बांटे,मगर मुई दिल्ली में भाई के परर्फोमेन्शन की चर्चा बिल्कुल भी नहीं। कहने वाले तो भाई को म.प्र. में सामाजिक सरोकारों का शिखर पुुरुष तक, कहने से भी नहीं चूक रहे हों।

वहीं सरकार के खजाने से सीधा निवाला घपकने वाले भी भले ही फिलहॉल चुप हो,मगर भाई के दिल में घर कर चुकी दहशत को कहां ले जाये जो भाई किसी से सीधे बात करने ही तैयार नहीं। जिस गरीब की खातिर वह मर मिटने का मंच से दम भरते दिखे, उनसे मिलने की फुरसत उन्हें कहां, भक्तों की भीड़ में कुचते भगवान ब'चा,विकलांग,गरीबों का आलम यह है, कि भक्त से मिलने की खातिर बैचारे भगवान ,फिलहॉल धक्के खाकर भी चुप है। और हो भी क्यों न? 80 हजार की संख्या में बैचारे भगवान भक्त के दर्शन करने भीषण गर्मी में घन्टों कलफते  जो रहे। 

अब इसे भाई की लेाकप्रियता कहे या फिर व्यवस्था का प्रबन्धन जो पिछोर के छत्रसाल स्टेडियम ही नहीं, पूरे पिछोर शहर में भगवानों का जनसैलाव भक्त को देखने उमड़  पढ़ा। बदरबास से आयी भांजी,और नारंद वंशज पत्रकारों की भीड़ भक्त के आगे चिल्लाती गिड़गिड़ाती रही मगर भक्त भाई का काफिला बगैर सुने ही चल पढ़ा। दलील ये रही कि आगे भी कार्यक्रम है। और भाई के पास समय कम, क्योकि कुम्भराज में भी भगवान भक्त के दर्शननाथ गाड़ी भरे एकत्रित है।

भैये-म्हारे को तो थारी ये कहानी कुछ समझ नहीं आई अगर ऐसा ही था तो 80 हजार भगवानों की भीड़ और गाड़ी भरे नांरद वंशज पत्रकारों की फौज आखिर पिछोर के छत्रशाल स्टेडियम में क्यों बुलाई।


भैया-कै थारे को मालूम कोणी चुनावों का शखंनाद हो रहा है। भाई की सरकार का जबर्दस्त जनकल्याणकारी शोर चल रहा है। वहीं कई भागों में बंटी कांग्रेस आज भी सžाा के लिए आपस में ल_म ल_ा हों धक्के खा रही है। मगर कांग्रेस है,जो म.प्र. में किसी कद्दावर नेता को नेतृत्व नहीं सौंप पा रही है। अब म्हारें बड़ बोले राजनीति के चाणक्य राजा को कौन समझायें कि म.प्र. में घुड़ दौड़ थोड़े ही चल रही है,जो उन्होंने ग्वालियर आकर व्यान ठोंक दिया कि मुख्यमंत्री की दौड़ में महाराज सबसे आगे है। हो सकता है,राजनीति के धुर राजनेता राजा की बात में स'चाई हों और उनकी इस व्यानबाजी में कांग्रेस की भलाई हों मगर भाया अपना तो कांग्रेस के युवराज मशवरा है। कि समय रहते म.प्र. के बारे में जो भी करना हों कर ले,बरना बाजी हाथ से छूठ जायेगी। ऐसे में, मने न लागे, तब तो शायद ही कांग्रेस की सरकार म.प्र. में बन पायेगी।

भैया- बात तो थारी सौं आने सच,मगर भाई मे दहशत कैसी?

भैये-क्या करें,लोकतंत्र में लोकप्रियता का पैमाना ही कुछ ऐसा है, कि लेाकप्रियता बड़ी और आ सुरक्षा दिल और दिमाग पर चढ़ी।

भैया-मने समझ लिया सामाजिक सरोंकारों के शिखर पुरुष भक्त और भगवान की मजबूरी,कहीं भीड़ में भगवान पूछे गये तो कभी भक्त ने वखशीस में फैंकी कोड़ी, ऐेसे में अहम मुद्दे 80 हजार के महाकुंभ में भाई के हाथों अधबीच ही छूट गये मगर जल्द ही भक्त, भगवानों के बीच 15 मई को फिर से आयेंगें। भगवानों के मठों में चौबीसों घन्टें विधुत प्रवाह बना रहें ऐसी व्यवस्था जमायेगें।

भैये-मगर चिंदी पन्नेें वाले खबरचियों के बीच भक्त की सरकार को लेकर बड़ा रोश है। सरकारी जलसा इतना बड़ा, मगर वखशीस न मिलने का बैचारों में अफसोस है,फिर भी भक्त ने खुले मंच से फरमाया है,कि पुलिस सुनिश्चित करें। कि अब न तो गांवों-गांवों शराब बिचेगी और न ही म.प्र. में कोई नई कलारी खुलेगी। गरीबों के सम्मान के लिए जान भी देनी पड़ी तो भाई देंगा मगर गरीबों को अपमानित नहीं होने देगा।

भैया-मने समझ लिया, शिखर पुरुष होने का सुख,जो हरे दूसरों के दुख,उससे बड़ा दुनिया में नहीं है, और कोई परम सुख। जय बोलो भक्त,भगवान की जय बोलो इन्सान की।



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