मप्र के तारणहार साबित होंगे सिंधिया

व्ही.एस.भुल्ले। राहुल फार्मूले से कर्नाटक में सत्ता की जंग जीत चुकी कांग्रेस की शुरुआत भर है। आगे भी अभी कुछ प्रदेशों में चुनाव होना शेष है। जिनमें म.प्र. छत्तीसगढ़, दिल्ली,राजस्थान जैसे प्रदेश है जिसमें सबसे विकट स्थति मप्र की है। जहां सर्वाधिक कांग्रेस गुटबाजी से ग्रस्त है।

ये अलग बात है कि राहुल अपने दो-दिवसीय दौरे के दौरान प्रदेश के सभी प्रमुख नेताओं को ताकीत की,कि वह गुटबाजी छोड़ एकजुटता के साथ म.प्र. में कांग्रेस की सत्ता ही नहीं उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भी भविष्य दिखा एकजुटता के साथ कांग्रेस को सत्ता में लाने की हुंकार भरी। मगर राहुल के आगे भी गुटबाजी की परम्परायें बखूबी बरकरार रही एक ओर प्रदेश भर में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा चल रही है।

वहीं दूसरी ओर केन्द्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी प्रदेश भर में यात्रायें हालकि कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव ग्वालियर आकर यह कह गये कि ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे है। अब ऐसे में कांग्रेस को कितनी कामयाबी हाथ लगेगी फिलहॉल कह पाना जल्दबाजी होगी।

कर्नाटक के अप्रत्याशित परिणाम गवाह है कि देश की जनता ने न तो कभी भ्रष्टाचार को स्वीकार किया है और न ही करेगी। मामला साफ है मप्र में विगत वर्षो से चली आ रही भ्रष्टाचार की बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर रखा है। उससे कुछ कांग्रेसी जो धड़ो की बात करते है वह भी बहती गंगा में हाथ धो चुके है या धो रहे है। और यहीं कारण कि सत्त की मलाई ने कांग्रेस को कई गुटों में बांट रखा है। अगर राहुल चाहें तो मप्र में भी कांग्रेस सम्मान सत्ता में वापसी कर सकती है।

जरुरत है राहुल को प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं को कर्नाटक की तरह कड़े निर्देश और दिए निर्देशों पर नजर रखने की। अगर प्रदेश के समुचे कार्यकर्ता और नेता केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे रख सžत्ता के अभियान की शुरुआत करे तो निश्चित ही कांग्रेस को स्वच्छ,निश्कंलक छवि का तारणहार सिंधिया के रुप में मिल सकता है। क्योकि कांग्रेस के अंदर फिलहॉल ऐसा दमदार बेदाग चेहरा और कोई नहीं। जो भाजपा की दस वर्ष पुरानी सरकार के गुŽबारे की हवा निकाल सके। जनता की तकलीफ यह है कि वह नैसगिक प्रकृति प्रदत्त सुविधाओं से मेहरुम तो है ही साथ हीं उसे जो शासकीय तिरस्कार उसे मिल रहा है। वह आम गरीब के स्वाभिमान की कीमत पर कतई स्वीकार योग्य नहीं है।

भ्रष्टाचार में सनी सरकार की दिक्क्त यह है कि जो सामाजिक सरोकार व्यवस्थागत सरकार ने आमजन के बीच परोसे वह सब भ्रष्टाचार के शिकार हो दम तोड़ते नजर आ रहे है। जिस तरह से सरकारी खजाने को किसी विचारधारा विशेष लेागों को लुटाया गया और सरकारी धन से राजनीति हो रही है आम गरीब के गाड़े पसीने की कमाई है। मगर दुर्भाग्य की कांग्रेस समूचे प्रदेश भर में कहीं पर भी कोई ऐसा आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई जिसके बल पर यह कहां जा सके कि विगत वर्षो में कांग्रेस द्वारा प्रदेश भर के आम गरीब दबे-कुचले लेागो की लड़ाई लड़ी गई हो। 

एक मात्र 'योतिरादित्य सिंधिया ही है जिन्होंने उमा भारती के शासन काल से लेकर बाबूलाल गौर,शिवराज सिंह चौहान की सरकार की जन विरोधी नीतियों के लिए प्रदेश भर मे अकेले ही घूम-घूमकर खरी खोटी सुनाई। जिसका खामियाजा भी उन्हें उठाना पड़ रहा है। मगर वह आज भी कांग्रेस नीति और राहुल का ऐेजेन्डा लिए एक कांग्रेसी कार्यकर्ता की भांति प्रदेश की भाजपा सरकार से लोहा-लेने में लगे है। यहां इस बात का उल्लेख करना वाजिब है जिससे राहुल भी यह जान सके कि जब उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी तब उन्होंने भ्रष्ट नेता और भ्रष्टाचार के खिलाफ जबर्दस्त अभियान की प्रदेश भर में शुरुआत की थी। कांग्रेस के बड़े बड़े सूरमा विरोध के नाम पर भूमिगत हो लिए थे। वो तो भला हो कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री धर्मपाल सिंह का जिनकी सरकार में तिरंगे का मुद्दा उछालते ही उमा भारती को मुख्यमंत्री पद त्यागना पड़ा। बरना आम गुटों को हवा देने वाले हवालतों में होते। फिलहॉल कई बातें ऐसी कहीं अनकहीं हो सकती है। जिन्हें कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने म.प्र. दौरे के दौरान राहुल से कहीं, शायद वे सोचने पर भी मजबूर होगें। कि म.प्र. में कांग्रेस को क्या दिशा देनी है।

म.प्र. में वापसी का मात्र एक ही रास्ता कांग्रेस के पास है कि राहुल कर्नाटक फॉर्मूले के साथ म.प्र में कांग्र्रेस का मुखौटा भी तय कर चुनावी जंग का ऐलान करे तो सत्ता कांग्रेस से कोई बहुत दूर नहीं। अगर बगैर राहुल के नेतृत्व के कांग्रेस चली तो, सžत्ता तो दूर, अगले कई वर्षो तक कांग्रेस को सžत्ता में आना मुश्किल ही नहीं नमुमकिन होगा।


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