पच्चीस लाख से अधिक भक्त मॉ के दरबार में पहुंचे

दतिया Žब्यूरो। ग्वालियर चंबल संभाग के सबसे बड़े प्रसिद्ध मेले क ा दतिया से लगभग उžार की दिशा में स्थित जंगल में विराजी मॉ रतनगढ़ के नाम से प्रसिद्ध माता मंदिर पर लाखों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने मॉ के दर्शन एवं पूजा अर्चना कर मनोकामना की। माता माण्डला देवी के नाम से प्रसिद्ध मंदिर म.प्र. के अलावा उत्तर प्रदेश के कई जिलों से भी भक्तों ने आस्था एवं विश्वास का केन्द्र बनी मॉ रतनगढ़ के दरबार में अपनी हाजिरी लगाई।

इस दौरान इस मेले की खास बात यह है कि मनुष्य को या जानवर को किसी जहरीला जीव डस लेता है तो मॉ रतनगढ़ के नाम का बंध लगा दिया जाता है जो आज ही के दिन कई पीडि़त व्यक्तियों एवं जहरीले जीव से पीडि़त जानवरों के मंदिर की सीमा में प्रवेश करते ही बंध खुल गये। जहरीले जीव से डसे जानवर की मात्र  रस्सी लाये लोगों के द्वारा जहरीले जीव के बंध सीमा में प्रवेश करते ही खुल गये। इसी वजह से इस मेले में लाखों की संख्या में भीड़ एकत्रित हो जाती है। लगभग 15 से 20 लाख की संख्या में उपस्थित लोगों ने मॉ के दर्शन किये। वैसे तो प्रत्येक सोमवार के दिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु मॉ रतनगढ़ के दरबार में पहुॅचकर अपनी मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद मांगते है पर यह भीड़ वर्ष में पडऩे वाली नवरात्रि के दौरान लाखों में बदल जाती है। यह मेला वर्ष में एक बार दीपावली की दौज पर लगता है।

मॉ रतनगढ़ का इतिहास


विंध्याचल पर्वत माला की इस उžारी ऊपत्यका पर सर्वप्रथम परमारों ने राज्य स्थापित किया था  रतनगढ़ राजधानी थी जिस स्थान पर रतनगढ़ के भग्नाववेश है। वहां पहुचना बड़ा कठिन था चारों ओर विंध्य श्रंखला की आकाश छूने वाली चोटियॉ प्रहरी का काम करती थी। तीनों ओर से रतनगढ़ का दुर्ग जंगलों से घिरा था। कहते है तेरहवीं शताŽदी के प्रारम्भ में अलादीन खिलजी ने इटावा होकर जब बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया उस समय रतनगढ़ के राजा रतनसेन परमार थे राजा रतनसेन के अवयस्क राजकुमार और एक राजकुमारी थी कहा जाता है कि राजकुमारी का नाम माण्डुला था । 

वह अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उन्हें पद्मिनी भी कहते थे । खिलजी ने राजकुमारी पद्मिनी को प्राप्त करने के उद्देश्य से रतनगढ़ पर आक्रमण किया था भयंकर युद्ध हुआ रतनसेन मारे गये राजकुल और क्षत्राणियों के साथ रतनगढ़ की हिन्दू महिलाओ ने रतनगढ़ के दुर्ग में जौहर वृत में प्राणोत्सर्ग किये। राजा रतनसेन का जिस स्थान पर दाह  संस्कार हुआ उसे आज चिताई कहते है राजा के साथ अनेक योद्धाओं का भी दाह संस्कार हुआ था । इस युद्ध में रतनगढ़ के सूरमाओं ने लड़ते-लड़ते वीरगति प्राप्त की  थी जब एक भी ब"ाा न बचा तब राजकुमारी तथा अबोध राजकुमार ने भी घास के ढ़ेर में आग लगाकर प्राण त्याग दिये थे जहां राजकुमारी ने प्राणोत्सर्ग किया था। 

उसी जगह एक छोटी सी मडिय़ा बना दी गई थी मडिय़ा के पीछे पहाड़ की समानंातर चोटी के छोर पर बना चबूतरा राजकुमार द्वारा प्राण त्यागने का स्थान है जिसे कु. का चबूतरा कहते हेै। कालांतर में राजकन्या और राजकुॅवर देवी कोटी में माने जाने लगे और उनकी पूजा होने लगी इन भाई बहनों की स्मृति में दीपावली की भाई दौज को लख्खी मेला लगता है।


ग्रामों में बढ़े योजनाओं के अमल की गति - परशुराम 



दतिया Žयूरो 15 नवम्बर। मुख्य सचिव आर परशुराम द्वारा वीडियो कॉन्फ्रेसिंग परख के जरिये प्रदेश के जिला कलेक्टर्स एवं संभागायुक्त से रूबरू हुए। दतिया में परख कार्यक्रम के दौरान आयुक्त ग्वालियर संभाग एस.बी. सिंह, जिलाधीश कबीरपंथी, सीईओ जिला पंचायत डा. रविकांत द्धिवेदी तथा जिला अधिकारी सम्मिलित रहे। मुख्य सचिव आर.परशुराम ने मनरेगा सहित ग्रामीण विकास योजनाओ ंके क्रियान्वयन की गति बढ़ाने के लिए समस्त कलेक्टर्स को निर्देशित किया। 

वीडियो कॉन्फेसिंग में निर्देश दिये गये कि आगामी माह ग्रामीण विकास सहित जिलों में औद्यौगिक निवेश प्रस्तावों के क्रियान्वयन के लिए किये जा रहे कार्यो की समीक्षा की जायेगी। उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कार्यक्रमों जिले में लोक सेवा प्रदाय केन्द्रों, धान उपार्जन, रवि फसलों की तैयारी, खाद आपूर्ति, कानून व्यवस्था आदि पर विशेष ध्यान देंवे।  


धन लालचियों से बढ़ता मानव को खतरा: पैसे की अन्धी दौड़ में दम तोड़ती सभ्यता


व्ही.एस.भुल्ले। म.प्र. ग्वालियर। अर्थ युग के बढ़ते दुष्षप्रभाव अब धीरे-धीरे लेागों के सामने आने लगे है। पैसे की अन्धी दौड़ ने लेागों को इस हद तक पागल कर दिया है। कि अधिक से अधिक पैसा कम समय में कमाने के चक्कर में व्यक्ति कुछ भी करने तैयार है। कम मेहनत कम लागत में और कम समय में अधिक से अधिक धन लालसा में व्यक्ति क्या नैतिक क्या अनैतिक कुछ भी कर गुजरने तैयार है।

जिस तरह की अन्धी दौड़ पैसा बनाने हमारे देश में चल पड़ी है। उसने अब मानव जाति के अस्तित्व पर ही सबाल खड़े करना शुरु कर दिये जिसके उदाहरण आये दिन हमारे सामने होते है। चाहे खादन्न,पेय,औषधि उत्पादन हो या फिर मार्केटिंग जिस तरह से बाजार के अन्दर अधिक मुनाफा कमाने के चक्कर में वस्तुओं की गुणवžाा को दर किनार कर वोगज घटिया उत्पादन एवं मिलावट जारी है। 

उसने समुची मानव जाति को झंझकोर कर रख दिया है। आज असली घी के नाम पर,नकली घी शुद्ध पेयजल जल के नाम पर,अशुद्ध पेयजल,असली दवा के नाम पर,नकली दवा और सुन्दर सŽजीयों और फ्रूटों के नाम पर कैमीकल युक्त फ्रूट और सŽिजयां दूध बाजार में बेचा जा रहा है। उसने अपना दायरा बढ़ाते हुये समुची मानव जाति को अपनी जकड़ में ले रखा है। जिसका मूल कारण देश के अन्दर अपर्याप्त कानून और सरकारों की उदाशीनता है। जिनकी जबाबदारी बनती है। कि वह देश के नागरिक और नस्ल की इन धन लालचियों से रक्षा करे। मगर दुर्भाग्य कि इस क्षेत्र में शासन और सरकारों के स्तर पर जितना कुछ होना था। नहीं हो सका यह पीड़ा आम नागरिक की है। मगर सुनने वाला कोई नहीं।

ज्ञात हो पूर्व ग्वालियर कलेक्टर आकाश श्रिपाटी ने जिस तरह से मिलावट खोरों और नकली घी उत्पादाकों के खिलाफ जो कार्यवाही की या फिर छžाीसगढ़ के रायपुर व मध्यप्रदेश के इन्दौर शहरों में पकड़े गये नकली मावा व उžारप्रदेश के कानपुर में दूध उत्पादन बढ़ाने इन्जेशन बनाने वाली फैक्ट्रियों छापामारी व राजस्थान सरकार द्वारा राजस्थान के कुछ शहरों में नकली दवा बनाने वाले दवा फैक्ट्रियों के छापो से सामने आई स'चाई से साबित हो जाता है। कि लेागों के अन्दर का इन्सान किस हद तक मर चुका है। 

जो पैसे के लिए मौत को बेचने से भी गुरेज नहीं रखते ऐसे लेाग शायद यह भूल जाते है। कि जो वह बाजार में परोस रहे है। उसका उपयोग उसके अपने भी कभी कर सकते है। मगर न तो इस दिशा में धन लालचियों कुछ सोचने की आवश्यकता है और न ही आम जागरुक नागरिक भी इस दिशा में सोच रहा है। धीरे-धीरे नया अर्थ युग हमारी नस्ल को ही खोखला कर रहा है। 

बल्कि समुची मानव जाति के लिए एक गम्भीर संकट खड़ा हों रहा है। जरुरी है,कि सरकारें समाज के और मानव जाति के दुश्मन बने चुके इन धन लालचियों खिलाफ कठोर कानून बनाये वहीं आम व्यक्ति समाज के अन्दर ऐसी जागरुकता लाये जिससे मानव जाति के अस्तित्व को बचाया जा सके। वरना नकली दवाओं नकली घी व नकली दूध सहित खादान्न सŽजी,फ्रूट उत्पादन बढ़ाने अन्धा धुन्ध बढ़ती पैस्टीसाईज के बढ़तें उपयोग से बरर्बाद होती मानव जाति को बचाना मुश्किल होगा।

मंहगाई ने तोड़ा मनोबल : तोड़े गए नियम


म.प्र. श्योपुर। मौके का फायदा उठाने में माहिर छोटे-बड़े दुकानदारों और फुटपाथी विक्रेताओं ने त्यौहारी सीजन में जमकर मनमानी का परिचय दिया तथा आम जनजीवन के मानस में बसे उल्लास को प्रभावित करने का काम किया। सामान्यत: तीन, पांच और दस रूपए की मिलने वाली फूलमालाओं और हारों को दीपावली के अवसर पर पांच, दस और बीस रूपए में बेचा गया। लक्ष्मी पूजन में उपयोगी कमल का फूल बीते साल से दोगुने दाम पर दस रूपए में उपलŽध रहा वहीं फलों के भाव आसमान पर जबकि गुणवžाा जमीन पर बनी रही। त्यौहार पूर्व निरीक्षण-परीक्षण की रस्म-अदायगी के बाद महापर्व के मौके पर उपहारों से बहले अफसरों ने दुकानों पर निगाहें डालने की जहमत नहीं उठाई, नतीजतन नियम-विधान हमेशा की तरह टूटते नजर आए। मिठाइयों के साथ जहां डिŽबों को धड़ल्ले से तोला जाता रहा वहीं मावे की मिठाइयों के साथ-साथ हानिकारक रंगों वाली मिठाइयां भी धड़ल्ले से बिकती नजर आईं।

खास-खबर। अधिकारों से फिर हुआ खिलवाड़


श्योपुर। सूचनाओं के सम्प्रेषण के मामले में मोबाइल क्रांति पर पूरी तरह से निर्भर हो चुके नगरीय और ग्रामीणजनों को सेवाओं के नाम पर चूना लगाए जाने का सिलसिला लगातार जारी बना हुआ है। तरह-तरह के प्रलोभन और भ्रामक संदेश भेजकर उपभोक्ताओं की जेबों का वजन हल्का करने के खेल में जुटी कम्पनियां कथित कंजक्शन के नाम पर सेवाऐं देने में असमर्थता जताने के बावजूद शुल्क की वसूली के मामले में किसी तरह की कोई उदारता नहीं दिखा पा रही हैं और उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन करते हुए चांदी की फसल काट रही हैं।

दीपावली महापर्व के दौरान परम्परागत तरीकों से भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों को गंतव्य तक पहुंचाए बिना लाखों-करोड़ों रूपए की शुल्क वसूली करने वाली निजी संचार कम्पनियों की नीतियों व कारगुजारियों को लेकर जहां उपभोक्ताओं में रोष की स्थिति बनी हुई है वहीं वर्ष भर उपभोक्ताओं को जागने और जगाने का संदेश देने वाले कथित संगठनों तथा संचार सेवा के क्षेत्र में क्रियाशील नियामक आयोग के अफसर और कर्ता-धर्ताओं की भूमिका पर भी सवालिया निशान लग गए हैं। गौरतलब है कि पांच दिवसीय दीपावली महापर्व के दौरान विभिन्न संचार कम्पनियों के उपभोक्ताओं ने अपने रिश्तेदारों और करीबियों को शुभकामना देने के लिए मोबाइल पर भेजे जाने वाले एस.एम.एस. का उपयोग बड़े पैमाने पर किया था जिनमें से महज दस से पंद्रह फीसदी मैसेज ही त्यौहारी सीजन में ठिकाने तक पहुंच पाए। बाकी मैसेज बुधवार की शाम तक प्रतीक्षा सूची में पड़े दिखाई दिए जो संभवत: आज गुरूवार को नाकाम घोषित कर दिए जाऐंगे। यह बात अलग है कि मोबाइल से मैसेज सेण्ड होने के साथ ही शुल्क के रूप में पैसे काटने का सिलसिला बीते हुए तीन दिनों में लगातार जारी बना रहा तथा इस शुल्क कटौती की सूचना रिटर्न मैसेज के जरिए ग्राहकों को कथित कंजेक्शन के बावजूद अनवरत मिलती रही। उल्लेखनीय है कि एस.एम.एस. जैसी सेवा के मामले में ठगी का यह कोई पहला मौका नहीं है तथा अमूमन प्रत्येक कम्पनी उपभोक्ताओं को इसी तरह से चूना साल-दर-साल लगाती आ रही है।

सम्पर्क साधने में भी होता है घाटा


यहां उल्लेखनीय है कि त्यौहारी सीजन में संचार कम्पनियां जहां कंजेक्शन के नाम पर शॉर्ट मैसेज सर्विस के जरिए जमकर चांदी काटती हैं वहीं दूसरी ओर उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन किए जाने का सिलसिला वर्ष भर भी जारी रहता है। प्राय: देखने में आता है कि कोई भी उपभोक्ता किसी दूसरे उपभोक्ता से सम्पर्क स्थापित करने के प्रयास में एक-दो कॉल के पैसे बेमतलब ही कटा बैठता है। एक तरफ से आवाज नहीं आने के कारण जहां उपभोक्ता को दोबारा प्रयास करना पड़ता है वहीं पैसे काटने को तैयार बैठी कम्पनियां अपनी इस तकनीकी खामी पर शर्मिन्दा होने के बजाय ग्राहक के बैलेन्स को तत्काल हल्का बना डालती हैं। ज्ञातव्य है कि ध्वनि तथा सिग्रल सम्बन्धित अवरोधों के कारण संपर्क स्थापित हुए बिना पैसे काटे जाने का मामला पहले भी तूल पकड़ चुका है लेकिन सरकार या उसके द्वारा गठित आयोग मिट्टी के माधो ही साबित हुए हैं।

पैसे भी गए मजा भी नहीं आया


शुभकामनाऐं भेजने के पारम्परिक माध्यमों को हाशिए पर धकेल कर मोबाइल क्रांति में भरोसा जताने तथा एस.एम.एस. जैसी सेवा को अपनाने वाले उपभोक्ताओं को संचार कम्पनियों की इस बदनीयती का नुकसान दो कड़वे अनुभवों के साथ भुगतना पड़ा। जहां एक ओर उन्हें अपने पैसे बेकार जाने का अफसोस बना रहा वहीं दूसरी ओर वे अपने करीबियों और खास लोगों को दीपावली जैसे बड़े त्यौहार की बधाइयां तक दे पाने से भी वंचित रह गए जो जनभावना से खिलवाड़ का सबसे बड़ा मामला भी माना जा सकता है। मोबाइल में रिचार्ज कराए गए व्हाउचर्स का बड़ा हिस्सा एस.एम.एस. की भेंट चढ़ाकर ठगे जाने का अहसास करने वाले उपभोक्ता आने वाले दिनों में संचार कम्पनियों के मायाजाल में कैद बने रहकर जेब कटाना पसंद करते हैं या फिर बधाई देने के दूसरे तरीकों की ओर उन्मुख होना पसंद करते हैं यह आने वाला समय ही बता पाएगा।

आपका कहना है.....

किसी को भी कोई संदेश भेजना हो तो मोबाइल की एस.एम.एस. सेवा से बेहतर कुछ नहीं लगता लेकिन त्यौहारों के सीजन में कम्पनियों की लचर सेवाऐं निराश करने वाली साबित होती हैं। इस बार दीपावली पर भी वही हुआ जो होता आया है। जितने भी संदेश भेजे गए उनमें से गिने-चुने संदेश ही सम्बन्धितों को मिल सके बाकी रास्ते में ही गायब हो गए।

डॉ. नरेन्द्र शुक्ला

चिकित्सक

निवासी-बड़ौदा

दीपावली पर अपने रिश्तेदारों और मित्रगणों सहित परिचितों को एस.एम.एस. द्वारा बधाई भेजने के बाद सोचा था कि परम्पराओं का निर्वाह हो गया लेकिन अब पता चल रहा है कि 'यादातर को संदेश मिले ही नहीं हैं। मोबाइल में देखने पर पता चला है कि कई मैसेज फैल हो गए हैं जबकि हर एक मैसेज के बाद चार्ज हाथों-हाथ काटा जा रहा था।

प्रत्यक्षा सक्सेना

छात्रा

निवासी-श्योपुर

मोबाइल कम्पनियों ने होड़ा-होड़ी करते हुए ग्राहकों की फौज तो बढ़ा ली है लेकिन सेवाओं के स्तर में सुधार के लिए तकनीकी आधार पर कोई विस्तार नहीं किया है। नतीजा यह होता है कि सेवाओं की प्राप्ति एक बार में संभव नहीं होती तथा एक बार की बात के लिए दो-दो बार पैसे कटाने पड़ते हैं। इस स्थिति से पीड़ा होती है लेकिन इलाज भी क्या है?

महेन्द्र जैन

भाजपा नेता

निवासी-श्योपुर

जिन सेवाओं के नाम पर अग्रिम शुल्क वसूला जा रहा है वह ग्राहकों को हर हालत में मिलनी चाहिए, इस बात का पक्ष उपभोक्ता अधिकार अधिनियम भी लेता है लेकिन हैरत तब होती है जब इस तरह के विधानों से जुड़े प्रावधानों के उल्लंघन पर शासन-प्रशासन के नुमाइंदे मूक दर्शक बनकर रह जाते हैं। आवश्यकता इस दिशा में कारगर कार्यवाही की है।

श्रीमती दुर्गेश नंदिनी

कांग्रेस नेत्री

निवासी-श्योपुर

दीपावली के शुभकामना संदेशों का ठिकाने तक नहीं पहुंचना, दो दिनों तक वेटिंग में पड़े रहना और फिर फेल हो जाना वाकई तकलीफ पहुंचाने वाला रहा। संचार सेवाओं में सुधार और उपभोक्ताओं के अधिकारों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को इस तरह की जानकारियां लगातार मिलती रही हैं लेकिन किसी भी स्तर पर कार्यवाही नहीं हो पाई है।

जयप्रकाश शर्मा

सामाजिक कार्यकर्ता

मोबाइल आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है तथा उसकी सेवाओं पर सब कुछ टिका हुआ है। समस्या पैसे खर्च करने की नहीं बल्कि पैसा खर्च करने के बावजूद परेशान होने की है। आपस में स्पद्र्धा करने वाली मोबाइल कम्पनियों को चाहिए कि ग्राहकों की संख्या को लेकर कीर्तिमान रचने के बजाय सेवाओं में सुधार लाऐं तथा लूट की प्रवृžिा से बचें।

गिरधर गर्ग

शिक्षक

निवासी-श्योपुर
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