बेहिसाब मनरेगा में हिसाब किताब की हालत खराब

व्ही.एस.भुल्ले/ ग्वालियर म.प्र/ ये अलग बात है। कि भाजपा के भीष्म पितामह माननीय लाल कृष्ण आडवाणी ने प्रोटोकॉल का पालन करते हुये पार्टी ...

व्ही.एस.भुल्ले/ ग्वालियर म.प्र/ ये अलग बात है। कि भाजपा के भीष्म पितामह माननीय लाल कृष्ण आडवाणी ने प्रोटोकॉल का पालन करते हुये पार्टी गाइड लाइन से हट विदेश में यू.पी.ए. सरकार की सबसे महात्वकांक्षी योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की हो मगर इसके उलट म.प्र. में खासकर ग्वालियर संभाग के शिवपुरी जिले में दम तोड़ती दिखाई देती है। कारण साफ है।
बेहिसाब म.न.रे.गा.के हिसाब किताब की हालत जिसको लेकर केन्द्र सरकार रा'य सरकार को विगत 4 माह से मजदूरी के भुगतान पर हीलाहवाली कर रही है। केन्द्र का आरोप है कि रा'य ने ऑन लाइन 25 फीसदी राशि का हिसाब केन्द्र को नहीं दिया है। जिसके चलते जनपद सी.ई.ओ एसोसियेसन ने काम ठप करने की धमकी दे रखी है। आंकाड़ों पर नजर डाले तो मनरेगा के तहत म.प्र. को विगत पांच वर्षो में 18000 करोड़ से अधिक की राशि केन्द्र से मिली। यह पहली मर्तवा है।

जब म.प्र. को मजूदरी भुगतान के लिए मात्र 1200 करोड़ की जरुरत है। जबकि केन्द्र ने मात्र 216 करोड़ ही दिये। जिसके चलते पंचायत जनपद प्रतिनिधि अधिकारी परेशान है।

देखा जाये तो भारत सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 के तहत 33 रा'यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के 619 जिलों में अब मनरेगा के नाम से स्कीम प्रचलित है। पिछले वर्ष जरुर केन्द्र ने विभिन्न रा'यों के 18000 करोड़ दिये थे मगर इस वर्ष मात्र 13000 करोड़ ही जारी किये जिसमें म.प्र. को मात्र 216 करोड़ मिले जबकि राजस्थान 1660 करोड़ ,आन्धप्रदेश 1050 करोड़,महाराष्ट्र 874 करोड़,पश्चिम बंगाल 2045 करोड़ ,तमिलनायडू 700 करोड़ ,मणिपुर 426 करोड़ ,मिपुरा 386 करोड़ जबकि ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब देश में मनरेगा की 2006 में शुरआत हुई थी तब म.प्र. पहले स्थान पर था। मगर अब कौन सा स्थान है।

ये तो म.प्र. सरकार ही जाने। जबकि इस योजना का मतव्य साफ था। कि ग्रामीण क्षेत्रों में अकुशल मजदूरों को स्थानीय स्तर पर कम से कम 100 की मजदूरी मांग करने पर अवश्य मिले। जिससे ग्रामीण परिसंपžिायों में स्थाई सृजन मजदूरों की आर्थिक और सामाजिक स्थति में सुधार के साथ उनका पलायन रोका जा सके।

केन्द्र व रा'य की सम्मलित राशि से छ: वर्ष पूर्व हुई म.प्र. में चल रही मनरेगा की हालत ऐसी होगी किसी ने सोचा भी न होगा। जिसका जीता जागता उदाहरण ग्वालियर म.प्र. के शिवपुरी जिले का है।

जहां शिवपुरी जिले में योजना के शुरुआती दौर में वर्ष 2002-03 के बी.पी.एल. सर्वे अनुसार ग्रामीण परिवारों की संख्या 2 लाख 43 हजार से अधिक थी। वहीं 2005-06 योजना प्रारम्भ के समय पंजीकृत परिवार और जाव कार्डो की संख्या 2 लाख 67 हजार से अधिक थी।

चंूकि रोजगार गारन्टी स्कीम मांग आधारित थी। 2006-07 में 1 लाख 29 हजार से अधिक परिवार से 2 लाख 22 हजार से अधिक आवेदकों द्वारा रोजगार की मंाग की गयी जिसके विरुद्ध कुल प्राप्त आवंटन 74 करोड़ 60 लाख की राशि से इन्हें रोजगार भी दिया गया। इसी प्रकार वर्ष 2007-08,2008-09,2009-10 में क्रमश: 170 450,151749,106669 आवेदकों को मांग अनुसार रोजगार तथा वर्ष 2007-08 में 121 करोड़ 45 लाख,वर्ष 2008-09 में 1 सौ 30 करोड़ व वर्ष 2009-10 में 81 करोड़ 18 लाख वर्ष 2010-11 में 71 करोड़ 15 लाख,2011-12 में 62 करोड़ 17 लाख,व वर्ष 2012-13 में सितम्बर तक 19 करोड़ 86 लाख रुपये से रोजगार मुहैया कराया गया,अगर 2006-07 से लेकर सितम्बर 2012 तक विगत 7 वर्षो में शिवपुरी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा के तहत खर्च रुपयों का आंकड़ा ले तो लगभग पांच सौ 46 करोड़ रुपये अभी तक खर्चा किये जा चुके है। जबकि 2006-07 में पंजीकृत गरीब परिवारों की संख्या 2 लाख 43 हजार घट कर मात्र 1 लाख 83 हजार के लगभग रह गयी है।

अब ऐसे में यक्ष प्रश्र यह है कि या तो 60 हजार गरीब गरीबी रेखा से बाहर आ चुके है। या फिर पलायन कर गये। इसका जबाब आज भी अनुतरित है। रहा सबाल स्थाई परिसंपतियों का तो आंकड़ें भले ही इनकी संख्या 14000 के आसपास बताते हो मगर इन 7 वर्षा के दौरान 24000 से अधिक कार्य स्वीकृत किये गये। वही आंकड़ों की ही माने तो 425 मानव दिवस विगत 7 वर्षा में सितम्बर तक सृजित किये गये।

बहरहॉल जो भी हो भले ही यू.पी.ए. सरकार इस स्कीम को लेकर अपनी पीठ थपथपाई या फिर आडवाणी जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता इस स्कीम की प्रशंसा कर राष्ट्र का गौरव बढ़ाये मगर हकीकत इसके उलट है। क्योकि जिस तरह से शिवपुरी जिले में शुरुआती वर्ष 2006-07,08,09 में करोड़ों रुपये खर्च हुये। क्योकि उस समय नगद भुगतान था। जैसे ही पैसा खातों में सीधे गया खर्चा आधा रह गया। जब मजदूरों के खाते खुल गये तो अब खर्चा मात्र 20 फीसदी ही रह जाना कई सबालों को जन्म देता है। जबकि न तो गांव ही सुधरे न ही गरीब कम हुये ऐसे पैसों को लेकर केन्द्र रा'य के बीच मारामारी फिलहॉल लेागों की समझ से परे है।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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बेहिसाब मनरेगा में हिसाब किताब की हालत खराब
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