आर्थिक उन्माद पर विवाद: फैसला सही प्रधानमंत्री

व्ही.एस.भुल्ले/ कोयला घोटाले की छत्र-छाया में उपजे आर्थिक उन्माद की माद से निकले एफडीआई में विदेशी निवेश और बढ़े डीजल,गैस के दामों पर ...

व्ही.एस.भुल्ले/ कोयला घोटाले की छत्र-छाया में उपजे आर्थिक उन्माद की माद से निकले एफडीआई में विदेशी निवेश और बढ़े डीजल,गैस के दामों पर देश के प्रधानमंत्री ने सहयोगी दलों और विपक्ष को दो टूक जबाब दे कह दिया है। कि फैसला सही है। उसके एक दिन पहले प्रधानमंत्री ने यह भी कह दिया है। कि अगर हमें जाना ही है। तो क्यों न हम लड़तें जायें।

संकेत स्पष्ट है। कि जब तक प्रधानमंत्री को यू.पी.ए. का समर्थन है। तब तक वह देश की जी.डी.पी.दर बढ़ानें के लिए इसी तरह फैसले लेते रहेगें परिणाम जो भी हो।

चाहे सहयोगी दल खुद को कोशे या फिर विपक्षी दल छाती कूटे मनमोहन सरकार पीछे हटने वाली नहीं।

आखिर एफडीआई रिटेल क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी और डीजल,घरेलू गैस में अप्रत्यशित वृद्धि के परिणाम जो भी हो मगर देश में प्रत्याशित आर्थिक सुधारों से पीछे नहीं हटा जा सकता।

मगर यहां सबसे बड़ा यक्ष प्रश्र यह है कि जिस देश की आधे से अधिक आबादी अशिक्षित और जागरुक  नहो ऐसे में इस तरह के निर्णय  कहा तक उचित है आज के समय में जिस उधारीकरण और देश की आर्थिक सुद्रढ़ता के लिए जो निर्णय हो रहे है। वह देश और परिस्थिति के चलते न्यायोचित नहीं कहे जा सकते। उदाहरण सामने है। जिस दरियादिली के साथ शिक्षा,संचार,और प्राथतिक संसाधनों या फिर शासन के माल कमाऊ क्षेत्रों में भारत सरकार ने देश की समृद्धि के लिये रास्ते खोले परिणाम सामने है। आज देश में भारत सरकार और उसकी भावनाओं के विपरीत सब कुछ उल्ट-पुल्टा चल रहा है। आखिर क्या जरुरत थी। इस देश को बड़े-बड़े  रिटेल सेन्टर,डीजल पैट्रेाल,गैस की देश और इस देश के नागरिक वैसे भी तो बगैर रिटेल सेन्टर मॉल,डीजल,पैट्रोल,गैस के जिन्दा थे।

मगर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे सब कुछ चौपट हो लिया।

आखिर क्यों कोई भारतीय यह नहीं समझ पाया कि व्यापार लाभ के लिए होता है। न कि नुकसान के लिए।

मगर इसके बाबजूद ऑटो मोबाईल क्षेत्र को अंधाधुन्ध उत्पादन की छूट दी गयी। देश के बैंको को ऑटो मोबाईल फायनेन्श में झोंक दिया गया। जबकि कर्ज से घर बनाने वाले बैंको के आगे गिड़गिड़ाते रहे देश किसान लाखों की संख्याओं में आत्म हत्या करते रहे है। मगर देश के बैंको से फायनेन्स ऑटो मोबाईल क्षेत्रों में होता रहा जो पैट्रोल,डीजल,गैस की बढ़ती मांग के लिए जिम्मेबार है।

जबकि देश की बढ़ती आबादी जो एक अरब के पार हो चुकी है। उसे ऑटो मोबाईल की बिलासिता में झोंक चाहे वह 2 व्हीलर हो या 4 व्हीलर ने निकम्मा बना दिया जिसके चलते देश में पैट्रोल,डीजल,गैस की खपत बढऩे के साथ उनके दाम भी आसमान छू रहे और देश की नस्ल,सुगर,वी.पी.हार्ड जैसी अन्य गम्भीर बीमारियों से ग्रषित हो बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ की ग्रास बनती जा रही है। देखा जाये तो एक ओर देश का मौटा धन विलासिता के चलते बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की जैब में जा रहा है। वहीं क्या बच्चे युवा बुजुर्ग गम्भीर बीमारियों से घिर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का सबसे बड़ा उपभोंक्ता बनता जा रहा है। एक ओर विदेशी कम्पनियाँ विलासिता की कीमत उगा रही है। तो दूसरी ओर दवा के नाम मोटी रकम कमा रही है। जिसके चलते राष्ट्रीय खजाना भी बरबादी के कगार पर है। और रुपया दिन व दिन कमजोर होता जा रहा है।

काश भारत सरकार ने  मानवीय ऊर्जा पर ध्यान दे नीति निर्धारित की होती तो सबा अरब लोगों की ऊर्जा का इस्तमाल कर डीजल,पैट्रोल,गैस कम्पनियों को ठेगा दिखाया जा सकता है। आज हालात यह है देश में जो काम पैदल चलकर हो सकता है। उसके लिये दिल खोलकर अनाप सनाप डीजल,पैट्रोल या फिर गैस का इस्तमाल हो रहा है।

आखिर भारत में क्या कमी है। जो विदेशी निवेश बुलाया जा रहा है। अगर व्यवस्था ठीक हो और संसाधनों का सदउपयोग हो तो विदेशी साहूकारों की इस देश को जरुरत ही नहीं काश देश के बैंक बड़े बड़े फ्रॉट,उद्योगपतियों,ऑटो मोबाईल क्षेत्र में फायनेन्स करने के बजाये घर से बेघर सर छिपाने छत तलासते देश वासियों और छोटे दुकानदारों,उत्पादकों किसानों को फायनेन्स करते तो इस देश की तस्वीर ही कुछ और होती। मगर क्या करे जिस रास्ते सत्तापक्ष अहम की खातिर चल पढ़ा है। हो सकता है सत्ता बनाये रखने वह रास्ता उसे मुफीद हो। वहीं जिस रास्ते विपक्ष और यू.पी.ए. सरकार के सहयोगी चल पढ़े है। उन्हे भी उनका रास्ता सही हो। अब सच क्या है फिलहॉल भविष्य के गर्भ में है,मगर इतना तो सच है। जिस रास्ते पर देश चल निकला है। वह रास्ता इस देश के लिए मुफीद नही है।

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तीरंदाज,328,व्ही.एस.भुल्ले,523,
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