देश बासियों का दर्द, 65 वर्ष में प्रश्न तो दूर, मरहम को तरसे लोग

व्ही.एस.भुल्ले
आज से ठीक 65 वर्ष पूर्व आजाद हुए भारत के लोगों ने आजाद होकर कुछ वर्ष बाद संविधान लागू होते ही इस पवित्र विधान में उल्लेखित समस्त धारा,उपधारा,अनु'छेद,अन्या,उपबंद आदि में लिखी सारी बातों का अक्षरश: पालन का स्वंय ही नहीं अपनी आने वाली पीढ़ी के जन्म होने से लेकर ङ्क्षजदा रहने और मरने तक के सारे अहम अधिकार संविधान उल्लेखित तत्संम्बत संस्थाओं को सौंप दिए थे और इन संस्थाओं से उम्मीद की थी।
 कि वह जब चाहे जैसे संविधान लिखित प्रावधानों के तहत देश के लिए उनका और उनकी परिसंपत्ति का उपयोग कर एक सुरक्षित भारत,सुरक्षित नागरिक समृद्ध,शक्तिशाली,खुशहाल राष्ट्र और इस राष्ट्र के लोागों को खुशहाल तथा समृद्ध बनाएंगे। मगर,अफसोस कि देश की एक अरब 20 करोड़ जनता में से संस्थागत लेागों में चाहे वह संवैधानिक पदों पर आसीन हो या फिर वह इस देश के घनाड्य पति हो को छोड़कर शायद ही शेष भारतवासियों को इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में बैठे लोगों से अपनी दुर्गति पर सबाल पूछने तक का हक नहीं। 
तभी तो इस देश की सरकार में संवैधानिक पदों पर आसीन लोग हिलती अपनी कुर्सी को देख सबाल करने वालों की फौज का नेतृव्व करने वाले अन्ना हजारे या फिर बाबा रामदेव जैसे आवाज उठाने वाले लोगों की चापलूसी करती है। तो कभी हताश हो चाहे रामदेव,अन्ना जैसे आन्दोलनों पर या फिर करोड़ों भारतवासियों की दुर्गति पर उठते सवालों पर उत्तर देना तक मुनासिब नहीं समझती।

आखिर क्यों?
यहीं सवाल आज देश की एक अरब से अधिक जनता के  मन मस्तिष्क को झंझकोर मजबूरी में आजादी की 65वीं वर्षगांठ पर वह स्वयं से ही सवाल करती नही थकती कि जिस लेाकतांत्रिक व्यवस्था को हमने जीने से लेकर जिंदा रहने और मरने तक के समस्त अधिकार बगैर कुछ मांगे  सौंप रखे हों आखिर वह इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है। 

हमारे देश ही नहीं देश के संविधान में मौत की सजा पाए एक जघन्य अपराधी से भी मरने से पहले उसकी इ'छा पूछने की परंपरा रही है। यहां तक की देश पर 200 वर्ष शासन करने वाले अंग्रेज भी देश के शहीदों को फांसी देने से पहले उनकी अन्तिम इ'छा पूछती थी कि मरने वाले की अंतिम इ'छा क्या है?

मगर,गजब है आजाद भारत की यह व्यवस्था की देश में हर वर्ष हजारों किसान या तो फांसी के फंदे पर भूल जाते है। या फिर अन्य कारणों से मौत को गले लगा लेते है। हजारों कुपोषित बच्चे इस्तरीय भोजन के अभाव में तिल, तिल मर रहे है। शेष भ्रष्टाचार,मंहगाई की मार से मर-मर कर जी रहे है। क्या इस पर सवाल करना नाजायज है। क्या इसके लिए संघर्ष करना राजनीति है? क्या भारत के आम नागारिक को राजनीति करने का अधिकार नहीं है। 

क्या राजनीति करने का अधिकार अब उन्हीं लोगों को है जिन्होने ऐनकेन प्रकारेण अकूत धन इकट्टा कर देश की सत्ता को हाईजैक कर रखा है। अगर ऐसा है तो ऐसे दल जो वंशवाद,धनबल और जाति बल,क्षेत्रबल का विष घोल इस आजाद भारत में खुलेआम साम्रा'यवाद और सामंतवाद  की जड़ों की सीचने में लगे है। वो मान लें कि अब उनके दिन इस महान लोकतंत्र में लदने वाले है। वैसे भी 13 का आंकड़ा कई मायनों में अपशगुन ही माना जाता रहा है।

जिस तरह से विखरे आजाद भारत के अंश-अंश को समेट सरदार बल्लभ भाई पटेल ने अखंड भारत का निर्माण किया था आज वह संवैधानिक अराजकता के टुकड़ों में बटता नजर आ रहा है। जहां तक संवैधानिक सत्ता का सवाल है तो दल भले ही अलग-अलग हो लेकिन सत्ता में बने रहने का नुख्शा और  उददेश्य एक ही है। सामंतवाद, वंशवाद और धनबल, कश्मीर से चलें तो सत्ता का वंशवाद उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनांडू, उड़ीसा, महराष्ट्र, बिहार, पंजाब, हरियाणा, असम, दिल्ली इत्यादि में इन स्थितियों के दर्शन सत्तासीनों के रुप में जब तब देश की जनता करती रही है। 

रहा सवाल असंवैधानिक अराजकता पूर्ण सत्ता का तो चाहे वह आतंकवाद हो, क्षेत्रवाद हो, नकस्लबाद हो यहां पर भी इन सत्ताधारियों से असहमत लोगों ने अपनी सत्ताएं इन सत्तासीनों को ठेंगा बता ताकत के बल कायम कर रखी है।

यहां तक की वह संवैधानिक संस्थाओं से भी दो-दो हाथ करने में पीछे नहीं रहते चाहे वह जम्मू-कश्मीर का आंतकवाद हो या फिर देश के बहुत बड़े भू-भाग तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, म.प्र., बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड इत्यादि में नकस्लबाद हो। यहां असंवैधानिक अराजकता की सत्ता इन सत्ता सžाासीनों के नाक के नीचे खुलेआम चल रही है। अंतर सिर्फ इतना है कि जो वंशवाद,क्षेत्रवाद,सांमवाद और धनबल के सहारे संवैधानिक सžाा हथियाए हुए है वहीं दूसरी ओर ताकत के बल अपनी बात ममवाने लोग स्वयं की सžाा कायम किए हुए है।

हालात ये है कि देश की एक अरब से अधिक आबादी को चैन और सुकून न तो संवैधानिक सत्ताओं में मिल रहा है। और न ही असंवैधानिक अराजकता पूर्ण सत्ता में। सवाल यहां भी जनता न तो इन सत्तासीनों से  कर पा रही है और न ही वह असंवैधानिक अराजक सत्तासीनों के आगे मुंह खोल पा रही है।

ऐसे में छद्म आजादी का ढोग-भले ही संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को मजबूरी हो। मगर आम भारतवासी आजादी से आज भी कोसों दूर है।

देश की राजधानी की सड़कों पर दौड़ते वाहनों में महिला और बच्चीयों के साथ गैंगरैप 2-जी स्पेट्रम, एशियाड खेले,कोयला खदान और जीवन बीमा के क्षेत्र में लाखों करोड़ के घोटालो से साफ है कि अन्ना,रामदेव ही नहीं ऐसे लाखों करोड़ो अन्ना,रामदेव और भारत सपूत यह सोचने और सवाल करने की तैयारी में है कि बताईए जो भी 65 वर्ष तक सत्ता में रहा उन्होंने तीन पीढिय़ों तक नि:स्वार्थ देश सेवा के नाम पर आखिर क्या किया?
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